Lampata Basu | लंपटा बासू | ‏لمپٹا باسو

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10-04-2022

18:36

चलो आज एक जादुई प्रयोगों वाले नेता के बारे में बताता हूँ! अगर दलितों के हितों की भी बात करें, तब तो गोबरपट्टी के स्वघोषित मसीहाओं से आगे निकल जाता है! सत्ता से घबराकर अपना भ्रष्ट इतिहास बचा रही माया मेमसाब से फार बेटर विचार और संघर्ष करता नज़र आ रहा है। पक्का पेरियार का चेला! (1)

दि स्टालिन! राजनीतिक विचार से इतर सामाजिक प्रयोगों के मसले पर मैं @mkstalin को आज के भारत का सबसे बड़ा रेवोल्यूशनरी कहूंगा! सुदूर दक्षिण में पिछले 10 महीनों में ये जादुई शख्स जिस ढंग से जर्जर और सड़ चुके सामाजिक ढांचे को टक्कर दे रहा है, गोबरपट्टी का कोई नेता नहीं कर रहा है! (2)

एक दम छाती तानकर चलने वाला शेर, जिसने ब्राह्मणवाद की छाती में सबसे बड़ी लात धर दी! ब्राह्मणवाद को यदि कोई गधा अपनी 'ब्राह्मण' जाति से जोड़े, वो 800 रुपया प्रति बीस मिनट खर्च कर, एक्स्ट्रा क्लास ले ले! शुद्ध बद्रीनाथ का ब्राह्मण हूँ, चक्षु खोलने वाले सत्य से रूबरू करवाऊंगा! (3)

..तो बंदे ने क्या किया! मठाधीशी खत्म करी, ज्ञान और सामाजिक शक्ति केंद्रों में मूर्ख ब्राह्मण पुजारियों के बेजा दखल को ईश्वर के चहेते वाक्य 'ज्ञान और सामाजिक समरसता' के विचार से चुनौती दी! जिसे बुरा लगे, तो लगे! पंडित मीन्स विषय का ज्ञाता... नॉट जनेऊधारी! यहां तक क्लियर है न? (4)

सामाजिक शक्ति केंद्र- मंदिर-मस्जिद-गिरजा! जहां हम ये सवाल तक बिसरा जाते हैं कि पादरी-पंडित-मौलवी कितना अनपढ़, दुनिया से बेखबर नोट गिनने में बिजी है! यकीन कर पाओगे जब उत्तर में सनातन के नाम पर गुंडे स्टेट को चुनौती दे, नक्सल से घातक हैं, तब स्टालिन ने धारा के विपरीत बहना चुना! (5)

स्टालिन ने सामाजिक ढांचे में उथल-पुथल कर, दूषित राजनीति में अलग दांव चुना! राजनीतिक तौर पर जो अभी अपरिपक्व लग रहा है, वो असल में अगले 100 सालों की राजनीतिक दिशा का आभाष करवा रहा है! ..एंड यस यहां मेरा हीरो वापस अपनी मजबूत मौजूदगी 70 साल पहले दर्ज करवाता है! बाकी जोक अपार्ट! (6)

नॉट महाराजा-धिराज, नॉट जम्बू द्वीपे भारत खंडे प्रोपेगेंडा मराज श्री श्री श्री बाल..! नॉट विनाश ने विकास बताऊन, 1988 में बिना इंटरनेट पहला मेल सरका आने वाले डंकापति साहब! मैं अपने हीरो की बात कर रहा हूँ... हां, अपने हीरो की! थोड़ा हीरोइक म्यूजिक का अहसाह करो, एंट्री तब होगी ...(7)

दिक्कत ये है कि तुम ससुरे हीरोइक म्यूजिक 'आजा-आजा दिल निचोड़े' समझ बैठे, जबकि मैं 'फ्री-फ्री फलीस्तीन' वाले बोल चाहता हूं! ..तो तमिलनाडु से पहले, फर्स्ट प्राइम मिनिस्टर पर चलते हैं. प्यारे मि. चचा नेहरू! यस भारत का हीरो चचा से बेहतर कौन होगा, जिनकी बदौलत मैं पढ़ सका, सीख सका! (8)

साल 1963 में गांधीजी से संबंधित प्रश्न, क्या आपके देश में गांधी-प्रकाश अब भी चमकता है? इस सवाल पर नेहरू ने कहा- 'आज जो भारत है उसे महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जन्म दिया. विचार रूप में हम उनकी संतानें है. अत्यंत अपूर्ण, बेहद मूर्ख संतानें, पर फिर भी हम उनकी संतानें |

सवालकर्ता के इस सवाल पर नेहरू का जवाब देखिए! वो चुपचाप भारत की दिशा बता रहे हैं। चचा बेहद सुलझे, भारत की मुहब्बत में डूबे रहने और भारत को दुनिया का सबसे बेहतरीन मुल्क बनाने में ही मर-खप गए! नेहरू ने अंबेडकर जैसे विद्वान पर भरोसा जताया, पटेल के विचारों को सम्मान दिया और.. (10)

..गांधी से मुलाकात के बाद वो जब तक जीवित रहे, उनके स्वराज्य की कल्पना को दुनियाभर के मॉडल्स की स्टडी कर साकार करने के लिए खाका बनाते रहे! खाका हवा में नहीं बना कि बादलों की ओट लेकर सरप्राइज दे दिया चचा ने! बापू-चचा ने लंबी बहस-मुबाहिसों और दुनिया के अपने इल्म से तैयार किया। (11)

गांधी, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना, पटेल, सोमनाथ लाहिरी, शास्त्री, सुभाष, टैगोर और भी उस दौर की कई महत्वपूर्ण शख्सियत जब मिलती होंगी तो भारत के बारे में उत्कृष्ठ विचार ही पेश करती होंगी! इनमें दुनिया जहां के बेहतरीन विवि में पढ़े हुए विद्वान थे। ..तो नाली की गैस से चाय नहीं बनाई! (12)

उन्होंने अनपढ़ और गरीब भारतीयों के हकों और देश की तरक्की का ख्याल रखते हुए, दिन रात एक कर मौजूदा समय का सबसे जरूरी और प्रामाणिक महाग्रंथ रचा- संविधान! रामायण और महाभारत की नाटकीय कथाओं से इतर, ये हिंदुस्तान की जमीं पर रचा गया सबसे शानदार ग्रंथ है! वो मुद्दों पर भिड़े हुए थे! (13)

इधर चचा दुनियाभर में ब्रांड इंडिया को मजबूत करते चले गए। देश के भीतर भी और बाहर भी! संविधान का उद्देश्य क्या होगा, चचा ने लिख मारा। चचा ने बहुत पहले ही धर्मनिरपेक्षता की वैल्यू किसी राष्ट्र की उन्नति में कितनी कारगर होगी, समझ लिया! इसे संविधान में शामिल कर, खुद निभाया। (14)

यस, नेहरू ने खाली कोरी लफ़्फ़ाज़ी नहीं की, बल्कि राजनीतिक नुकसान और भारतीयों के गुस्से को दरकिनार कर, पद पर रहते हुए मंदिर-मस्जिद के उद्घाटन के विचार को खारिज कर दिया। ईश्वर में आस्था होने के बावजूद। वो भिड़ गए अपने समकक्षों से कि ऐसे तो खज़ाना मंदिर-मस्जिद निर्माण में लुट जाएगा?

ईश्वर को नेहरू ने निजी मसला मान, देश की सियासत में धर्म की दखलंदाजी को बंद करने का मजबूत संदेश दिया। कई धर्मों -पंथों में लड़ाई देखा हुआ आदमी, यही करेगा। यही समझदारी है। धर्म लाइफस्टाइल है, जबकि सियासत हमारा भाग्य तय करेगी! धर्म और राजनीति के कॉकटेल का हाल हम देख ही रहे हैं? (16)

..तो नेहरू ने भारत के गरीबों का उत्थान चुना, न कि मठ-मंदिर-मस्ज़िद-गिरजा में बिना काम ईश्वर के नाम पर तोंद चढ़ा रहे धर्म-भीरू चालाक लोगों का। देश कल-कारखानों में हाथ-पांव कटवाकर भारत को मजबूत कर रहा था, रोटी के लिए जूझ रहा था, तब धर्म स्थलों के जरिये बेकाम मालामाल हो रहे थे? (17)

नेहरू ने सरकार को धार्मिक मसलों में उलझे बिना तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चलाने की पैरवी की। हमेशा..।चाहते तो नेहरू भाले-तलवार उठाकर पहले से ही लड़ रहे हिन्दू-मुस्लिम को बरगला कर मौज काट सकते थे, लेकिन वो मेहनती और ईमानदार आदमी थे। उन्होंने आईआईटी-अस्पताल बनाना चुना। (18)

ये नेहरू का कद था जो दक्षेश के रूप में हमें दोस्त मिले! द रियल शार्क! नॉट लाइक @Ashneer_Grover! खैर, आज क्या स्थिति है! अमेरिका की सांसद हमारे पीएम को तानाशाह पिनोशे बता रही है। ये शर्म नाक है। बतौर देश ये हमारी ब्रांडिंग पर चोट है, ग्लोबल दुनिया में ब्रांड राजनीति तय करेगा! (19)

..तब नेहरू ने सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन कर गलत संदेश देने के बजाय, विज्ञान का पथ चुना। वक़्त अलग था, दौर अलग था सीधे भी नहीं कह पाए कि या तो जगराते-हवन कर लो या देश चला लो! सम्मान करना भी जरूरी था दूसरों की आस्था का, लेकिन यही आस्था हमारे सड़े हुए समाज के रूप में सामने आ गई। (20)

अभी दो चार बातें और आनी हैं तब वापस स्टालिन और बाकी। सोने जा रहा हूँ मैं, कोई जुर्माना तो नहीं देना होगा न!



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